Tuesday, 14 June 2011

" मैँ वहीँ हूँ "

कभी उन रास्तोँ पर जाना जहाँ
हम मिले थे , तो
थोड़ी देर रुकना , और सोँचना कि हम क्योँ मिले थे और फिर चल पड़ना , शायद जवाब न आये पर चलते रहना और , थोड़ी देर के बाद फिर रुकना और सोँचना कि हम क्योँ अलग हुये ? और क्योँ तुम बिना कुछ बताये ही वापस आ गये मुझे छोड़कर आखिर क्योँ ? शायद इसका भी जवाब न आये पर तुम चलते रहना रुकना मत . . . . .. पर अब रुकना और सोँचना कि क्या तुमने सही किया था और अब तुम्हेँ रुकना पड़ेगा जवाब न आने तक अगर वो जवाब " न " है तो थोड़ा गौर से देखना उन रास्तोँ पर किसी के पैरोँ के निशान हैँ हाँ वो मेरे हैँ मैँ वहीँ हूँ जहाँ हम अलग हुये थे " मै आज भी तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूँ क्योँकि मुझे आज भी उस कसम के मायने पता हैँ जिसमेँ हम ने साथ मन्जिल तय करने की बात कही थी , मैँ नहीँ भूला पर शायद तुम ..... पता नहीँ !

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